जैसे मां बच्चे को सीने से लगा लाई हो
अब के फिर जाग के रातों की ख़नक देखी हैकितनी सुंदर है वो एहसास की मूरत की तरहजैसे पाज़ेब किसी ने कहीं छनकाई होजैसे मूरत कोई रस्ते पे निकल आई होजैसे गुलनाज़ कोई टब से नहा कर निकलेजैसे खुश्बू लिए बाद-ए-सबा आई होजैसे जंगल में कोई राग नया छेड़े होजैसे बदमस्त...
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Razi Shahab
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[10 Jan 2010 03:45 AM]



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