दो संसार

दिल-ए-नादाँ ये कविता मिथिलेश ने लिखी है मेरे साथ इंदौर भास्कर में सेवारत हैं. मिथिलेश खेल डेस्क पर हैंजहाँ मैं रहता हूँवहीँ पास में एक नाला बहता हैनाले के पार एक अलग है दुनिया बसती हैइस पार से एकदम जुदाइस पार घर नहीं हैंबंगले हैंबड़ी कारें हैंलान हैंरोज धुलने वाली... [पूरी पोस्ट]
writer संदीप पाण्डेय

दुनिया

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[10 Jan 2010 02:48 AM]

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