'सह्याद्रि' के लिए .....
बारिश कब की जा चुकी है,अब सर्दियाँ भी जाने को हैं,उसके तन सेएक एक वस्त्र झर रहा है |ये पत्ते धागे हैं इन वस्त्रों के,जिनमें लिपटजब खड़ा हो जाता है वो, मीलों दूर सेखींच लेता है नेत्रों को !मिटा देता है !ना जाने कितनों की थकानदे देता है !कितने अधरों को...
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निपुण पाण्डेय
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[10 Jan 2010 01:20 AM]



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