क्या .. तुम हो ...... ! [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

तृषा'कान्त' कवि के स्वर में घर के कोनों मेंबंद रोशनदान सेफूटती किरण .....चमकती स्वर्णरेखा ......मकड़ी के जालों परपड़ती है जबस्मृति की धूप ....कुलबुलाने लगता हैकीड़े जैसा फंसा मनतड़प तड़प करदम तोड़ देता हैचंचल उन्मुक्त मनस्मृतियां .....सदैव नहीं होतींफूलों का सुखद... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

कविता

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[10 Jan 2010 00:13 AM]

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