इंतज़ार
मेरे महबूब तुम्हारे इंतज़ार नेउम्र के उस मोड़ परला खड़ा किया हैजहां सेशुरू होने वाला एक सफ़रसांसों के टूटने परख़त्म हो जाता हैलेकिन-फिर यहीं से शुरू होता है एक दूसरा सफ़र जो हश्र के मैदान में जाकर ही मुकम्मल होता है...इश्क़ के इस सफ़र में मुझे ही तय करना...
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फ़िरदौस ख़ान
नज़्म
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[09 Jan 2010 21:19 PM]



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