कुहरा
बादलों के रंग देखो उड़ उड़ के रह गये अश्कों की बरसात देखो बिन कहे ही बरस गये। शीत ने अपनी घनी चादर रंग में कुहरे के बिछाई उसके छंटने के इन्तज़ार में बस आंख मल के रह गये। सूरज ने भी ना निकल कर रंग दिखाये अपने ताव के चादरों के झरोखों से उसके दीदार को रह...
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JHAROKHA
कविता
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[09 Jan 2010 10:49 AM]



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