अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी
इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा
इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा
लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत
भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा
गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है
अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच के न रहना
आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह...
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अफ़लातून
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[09 Jan 2010 06:59 AM]



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