गलत वक्त क्यों बात कही
समझ न पाता चालबाजियाँसन्तू है कितना भोलालगी धूप भी जब ठण्डी सीतो सूरज से यूँ बोंला“सूरज दादा बात आपकीअच्छी नहीं मुझे लगतीआप आजकल गायब मिलतेजब दुनिया सोकर जगतीगरमी में कंधे रगड़ातेचाहे लाख कोई झिड़केदेर शाम को सोने जातेऔर जाग जाते तड़केसर्दी में क्यों दूर...
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विवेक सिंह
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[09 Jan 2010 01:53 AM]



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