बेतरतीब
अंगुर-अंगुर, भंगुर-भंगुर, झींगुर-झींगुर झन्नाटाकतरा-कतरा, पसरा-पसरा,बिखरा-बिखरा सन्नाटा।बढते-बढते, चढते-चढते, लुङके-लुङके चित्त पङे,उजले-उजले, पिघले-पिघले, बिखरे-बिखरे चित्र बङे।पस्त-पस्त फिर सुस्त-सुस्त फिर ज़बरदस्त एक फर्राटा,कतरा-कतरा,...
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RUPAK_REWA
कविता
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[08 Jan 2010 19:02 PM]



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