स्वतंत्रता ही नियती है

वो चुप न रह सका स्वतंत्रता का न ओर हो सकता है न छोर, लेकिन सत्य में तो स्वतंत्रता का दायरा उतना ही सीमित या विस्तृत होता है जितने की आपका समाज इजाज़त दे. जहां भौंहें उठना चालू होती हैं वहां choices बहुत जल्दी embarassment बन जाती हैं. लेकिन अगर कोई ध्याद दे तो पायेगा कि... [पूरी पोस्ट]
writer विश्व

स्वतंत्र लेखन

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[08 Jan 2010 12:03 PM]

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