"बिक न जाना वो पहरुवे हाथ में तुम्हारे कलम है" - EK REPORT

यादों का इन्द्रजाल... Hindi Poetry by Sulabh दो दिन सात सत्र ३२ घंटे, डूबा रहा मैं कवि संगम में.... वन्दे मातरम् का नारा है तिरंगा हमको प्यारा है जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं वो ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं और...... जो वक़्त की आंधी से खबरदार नहीं है वो कुछ और... [पूरी पोस्ट]
writer सुलभ 'सतरंगी'
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[08 Jan 2010 07:45 AM]

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