प्रत्यंचा
मन की धाराएँतटों से टकराकरजब गुमसुम सी लौटती हैं तो दिशा बदलक्षितिज के विस्तार में बढ़ने लगती हैं और धरती से आकाश तकअपनी प्रत्यंचा खींच देती हैं...
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रश्मि प्रभा...
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[08 Jan 2010 06:47 AM]



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