ये गहरी खाइयाँ क्यूँ है |
ख़ुशी के समन्दर में,ये गम के बुलबुले क्यूँ है |अपनों के इस भीड़ में,हम यहाँ तन्हा क्यूँ है|यूँ तो सूरज रोज आता है, मेरे दर पर हर सुबह| फिर भी मेरे दर पर, ये घोर अँधेरा क्यूँ है |साथ चलने से यूँ...
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Tapashwani Anand
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[08 Jan 2010 02:18 AM]



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