अपने होटों से क्या छू दिया आपने !
ग़ज़लजिस्म में अपने वो गर्मियाँ ना रहीं.उनके चेहरे पे भी सुर्ख़ियाँ ना रहीं.पीछे-पीछे कभी जिनके भागा किये,बाग में वो हसीं तितलियाँ ना रहीं.रफ़्ता रफ़्ता क़रीब आ गये आपके,बीच में अपने अब दूरियाँ ना रहीं.अपने होटों से क्या छू दिया आपने,ज़िन्दगी में कोई...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[07 Jan 2010 04:08 AM]



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