जीने की जो चाह है तो मौत से भी नेह कर
रात न ढले तो कभी भोर नहीं होती बन्धुसांझ न ढले तो कभी तम नहीं होता है लोहू तो निकाल सकता तेरे पाँव में से कांच से मगर घाव कम नहीं होता है जीने की जो चाह है तो मौत से भी नेह कर डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है सच मानो जब तक पीर का काग़ज़ न हो कवि की...
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कवित्त
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[07 Jan 2010 02:23 AM]



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