कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात
"ज़ीवन के रण से तू न भाग"प्रज्जवलित कर उर की मशाल,कुछ ऐसा कर उन्नत हो भाल,जीवन के रण से तू न भाग,कर सामना कर सीना विशाल ।चाहे व्यथित हो मन तेरा,हो चाहे चेतना अभिवंचित,लक्ष्य पाने का अभिमाद,न खोना तू कभी किसी हाल ।हो कंटकी कितनी भी राहें,रखना फैलाये तू...
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©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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[07 Jan 2010 02:16 AM]



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