ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन

कुछ तो है... जो कि, विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी । मेरी पिछली कई पोस्ट [...]... [पूरी पोस्ट]
writer डा. अमर कुमार

तलाश एक साफ-सुथरे दिमाग की

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[02 Jan 2010 11:23 AM]

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