प्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तो
प्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तो बरसों बाद आकर तुमसे मैं कोरों में चुपचाप मिलूँगीबिन चाहे अथाह सागर सेपानी बन झरना झर लूँगीलाली बन के शाम रँगूंगीरात को सपना बन बिखरूँगीप्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तोसदियों बाद अपनी उंगली सेलिपटा जो इक क्षण...
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मानसी
poetry
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[06 Jan 2010 22:57 PM]



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