मेरी आवाज़ सुनो...!

मेरी आवाज़ सुनो...! तुम्ही सो गए दास्ताँ कहते कहते....!!! ............और अब सामने प्रभाष जोशी और सन्नाटा छा जाए। जो डराने लगे। असम्भव है। लेकिन यह भी हुआ। पहली बार डर लगा... दिमाग में कौंधा, अब। एम्बुलेंस का दरवाजा बंद होते ही खामोशी इस तरह पसरी कि अंदर चार लोगों की मौजूदगी... [पूरी पोस्ट]
writer प्रबल प्रताप सिंह्
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[08 Nov 2009 06:29 AM]

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