ज़मीन से कटा हुआ आदमी

कवितायन हवा,जिसे हम महसूस कर लेते हैंबहते हुये / शरीर को छूकर गुजरते हुये या कभी सूखते हुये पसीने की ठण्डक में ना,तो मैंने उसे देखा है ना ही आपने देखा होगा वही हवा, जब भर जाती है इन्सान में तो नज़र आती है उनकी बातों में जो ज़मीन के ऊपर ही उतराते हुये ना किसी के... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[06 Jan 2010 09:00 AM]

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