"वक्त की पाठशाला में एक साधक"-श्री समीर लाल ’समीर’ बिखरे मोती की समीक्षा आदरणीय देवी नागरानी जी द्वारा ।
कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता है. ऐसे ही रचनात्मक संभावनाओं में जब एक कवि की निशब्द सोच शब्दों का पैरहन...
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पंकज सुबीर
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[11 Nov 2009 23:54 PM]



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