जिनके बदले लिखा जा सकता है सिर्फ़ एक शब्द – समझौता
परिचययहां दर्ज़ करना है अपना नामवे डिग्रियां जिन्हें पलट कर भी नहीं देखा वर्षों सेविस्तार से देनी है जानकारी उस दफ़्तर कीजिसमें प्रवेश करते ही लगता हैथोड़ी और बौनी हो गयी आत्मापता लिखना है उस घर काजिसके लिये गिरवी पड़े हैंमेरी ज़िन्दगी के बीस सालयहां दर्ज़...
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अशोक कुमार पाण्डेय
कविता
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[05 Jan 2010 22:34 PM]



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