मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं
मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूंगहरे है ज़ख्म तनिक सीना चाहती हूंहावी अधिकार, बंटता मजहब मरते लोगगौण कर्तव्य, मौन स्वधर्म, नहीं ईश से योगसब हंसे, सब सुखी वो मीना चाहती हूंमैं कलम...बिकती बहनों, भूखी मांओं, नंगे बच्चों लुटती पांचाली, वधित क्रौंचों को...
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चेतना के स्वर
kavita
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[05 Jan 2010 06:56 AM]



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