अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र

कतेक रास बात आई संजूक दुरागमन छैक। आईसऽ करीब एक बरिसक पूर्वक गप्प अछि। पोड़का साल बैसाख मे ओकर वियाह भेल रहैक। वियाह मे कतै खुशी रहै, संजूक मोन खुशी सऽ आह्लादित रहैक। विवाह सँ पहिनहि ओ अपन मन-मंदिर मे कतेक सुन्नर वरक कल्पना कयने छल? वियाहक नाम सुनितै ओकर मन रोमांचित... [पूरी पोस्ट]
writer सम्पादक: कतेक रास बात
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[04 Jan 2010 13:30 PM]

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