नया साल फिर से आया है

shuruwat हम जो सोचते हैं वोह दुनिया नहीं है ,अब तो माँ के हाथ का खाना भी नहीं है ,दर्द सब के दिल में पल रहा है ,सब कुछ साथ साथ चल रहा है . कभी खत्म नहीं होगा दर्द ,जिन्दगी तो काल चक्र है ,आज भी मुस्कुराहट की पुडिया मुफ्त है ,लेकिन रोने वाली पुडिया तो घर घर उपलब्द... [पूरी पोस्ट]
writer mere shabd
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[04 Jan 2010 10:39 AM]

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