उस जानिब रूहानी तक़द्दुस चेहरे

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....-यह नीम की पत्तियाँ झड रही हैं न...-हाँ,... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

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[04 Jan 2010 10:53 AM]

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