अश्क बहते नहीं उम्र भर,ग़म न कर अय मेरे हमसफ़र.

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद. ग़ज़लतुम तपिश दिल की बढ़ने तो दो, बर्फ पिघलेगी ही एक दिन.तोड़कर सारी जंज़ीरें वो, घर से निकलेगी ही एक दिन.शौक़ जलने का परवाने को, होगया आजकल इस कदर,लाख कोशिश करे कोई भी, शम्आ मचलेगी ही एक दिन.अश्क बहते नहीं उम्र भर, ग़म न कर अय मेरे हमसफ़र.बात बिगड़ी है... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[04 Jan 2010 09:01 AM]

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