ग़ज़ल - अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरा किरदार मरता है
अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरा किरदार मरता हैजो बोलूँ सच तो फिर भूखा मेरा परिवार मरता हैशिकायत सबको है मुझसे कि मैं कम कहता हूँ, लेकिनरहूँ मसरूफ कहने में तो कारोबार मरता हैमुझे लगता है मेरी ज़िन्दगी का अंत यूं होगाबिना उपचार के जैसे कोई बीमार मरता हैअना जिंदा...
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kavideepakgupta
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[03 Jan 2010 23:42 PM]



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