हम तुम्हारे है नहीं कुछ भी मगर
हम तुम्हारे है नहीं कुछ भी मगरगर मिलें तो जिन्दगी जाये सँवरबाँकी चितवन और थी तिरछी नजरचढ़ गई तलवार ज्यों हो सान परघटता बढ़ता चाँद तो है बेवफ़ारात फ़िर भी है उसी की हमसफ़रअब महाभारत रुके कैसे भला आ खड़े हैं जब सभी मैदान परभूलना मुमकिन कहाँ है दोस्तोदेखना उसका...
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श्याम सखा 'श्याम'
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[03 Jan 2010 22:12 PM]



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