सात पग साथ मिल तुम मेरे जो चले
धूप के चन्द छींटे मिलें साध येएक लिपटी हुई थी सदा ही गलेमिल गई दोपहर हमको बैसाख कीसात पग साथ मिल तुम मेरे जो चलेचाँदनी का पता पूछते पूछतेरात आती रही रात ढलते रहएक भोली किरण पंथ को भूल कर, आ इधर जायेगी आस पलती रहीबन के जुगनू सितारे उतरते हुए राह को दीप्त...
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राकेश खंडेलवाल
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[03 Jan 2010 21:25 PM]



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