इस साल का पहली कविता जैसे एक पैगाम, अपने ही देश के कुछ लोगों के नाम,कृपया बुरा ना मानें क्योंकि कही कुछ तो ऐसा है ही.

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने हम जनता है, हमको तो बस शोर मचाना आता है,मुट्ठी में है लोकतंत्र,लेकिन हम अज्ञान पड़े,बस रोज़ी-रोटी मिल जाए,यही हमारे लिए बड़े,सोच यही पर सिमट गयी है,इसीलिए कुछ नही चली,जिधर घूमाओ घूमेंगे हम,बने हुए बस कठपुतली, जनता होने का हमको, बस फर्ज़ निभाना आता है.... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[03 Jan 2010 10:47 AM]

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