ग़ज़ल

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर दिल में याद लिए तेरी बैठा हूँ मैं फ़क़त तसव्वुर में तेरे दुनिया भुलाये बैठा हूँ मैं खंजर सी तेरी नज़रें वो हुस्न कातिलाना अंजामे वफ़ा के जख्म लिए बैठा हूँ मैंइक तबस्सुम की खातिर सौ जिल्लतें सही हैं उजड़े हुए गुलशन में ख़ार लिए बैठा हूँ मैं तेरे हुस्न... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[03 Jan 2010 05:48 AM]

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