कविता : होटल के इस कंबल में
जब भी किसी होटल में ठहरता हूं तो स्नानघर या ड्रेस टेबल के आईने पर चिपकी बिंदियां उस कमरे को घर बना देती हैं। अगर किसी होटल में यह सब ना हो तो लगता है, यह होटल कम चलता है या यहां साफ-सफाई का खास खयाल रखा जाता है। राजेश जोशी ने जयपुर के स्वीट ड्रीम होटल...
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प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
कविता
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[03 Jan 2010 04:31 AM]



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