मैंने तो जीना कब का छोड़ दिया है
मैंने तो जीना कब काछोड़ दिया हैएक निर्जीव , स्पन्दनहीनजीवन जी रही थीफिर तुम ठहरे हुएपानी में क्यूँउम्मीदों केकंकड़ फेंकते होक्यूँ अपेक्षाओं केबीज बोते होसंवेदनाओं के बेल -बूटेसब सूख चुके हैंजानते हो , मुझे पता हैतुम कभीखरे नही उतर पाओगेमेरे सपने ना...
[पूरी पोस्ट]
वन्दना
28
3
0
3
13
[03 Jan 2010 00:09 AM]



Shuffle








