मैंने तो जीना कब का छोड़ दिया है

zindagi मैंने तो जीना कब काछोड़ दिया हैएक निर्जीव , स्पन्दनहीनजीवन जी रही थीफिर तुम ठहरे हुएपानी में क्यूँउम्मीदों केकंकड़ फेंकते होक्यूँ अपेक्षाओं केबीज बोते होसंवेदनाओं के बेल -बूटेसब सूख चुके हैंजानते हो , मुझे पता हैतुम कभीखरे नही उतर पाओगेमेरे सपने ना... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[03 Jan 2010 00:09 AM]

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