अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी
शूलों से जो डर-डर चलता है आदमी तो पांव नीचे फूलों को मसलता है आदमी अन्न जैसे कंचन को कूड़ा कर फैंकता है अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी जाने किस बात की अकड़ है जो ऐंठ -ऐंठ दो-दो फीट ज़मीं से उछलता है आदमी गौर से जो देखा बन्धु मुझे ऐसा लगा जैसे अपनी ही आग में...
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[02 Jan 2010 08:56 AM]



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