प्रिया तुम्हारी पैजन छम-छम
प्रिया तुम्हारी पैजन छम-छम,बाजे मन अकुलाए।जोगी मन को करे बिजोगी,नैनन नींद चुराए।।बोले जो मिसरी रस घोले,शकन हरे पूछ के कैसे?बसी श्यामली मन में,धड़कन का घर हिय हो जैसे, मिलन यामिनी, मद मदिरा ले, जग के दु:ख बिसराए।कटि नीचे तक, लटके चोटी,चंद्र वलय के से दो...
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गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल'
anubhooti
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[01 Jan 2010 23:34 PM]



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