मैं आसमान बेच कर चाँद नहीं कमाती ....
सारा का पहला ख़त अमृता को १६ सितम्बर १९८० में मिला उस में लिखा था ...अमृता बाजी ! मेरे तमाम सूरज आपकेमेरे परिंदों की शाम भी चुरा ली गयी है !आज दुःख भी रूठ गया है कहते हैं ...फैसले कभी भी फासलों के सपुर्द मत करना !मैंने तो फासला आज तक नहीं देखायह कैसी...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[02 Jan 2010 05:36 AM]



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