ये अन्धों का गांव हैं, बोले दास कबीर
सब गूंगे हैं, सब बहरे हैं,
सब लिये मुखौटे चेहरे हैं
सब सीना तान सिकन्दर हैं
सब गांधी जी के बन्दर है
तू औरत है, चुपकर, चुपकर
बैठेगी क्या सिर के ऊपर?...
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daskabir
चंहु दिसि लागी आग
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[02 Jan 2010 02:40 AM]



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