माया
(भारतीय संस्कृति में अपनी जड़ें फैलाता वैश्विक बाज़ारवाद ,उपभोगवाद की प्रवृति, धनोपार्जन के भ्रष्ट तरीकें एवं झूठी प्रतिष्ठा की ललक हमारी संस्कृति को किस तरह खोखला कर रहीं हैं, इसका ज्वलंत उदाहरण पेश करने वाली यह कहानी २००५ में लिखी गई थी,जो लेखिका के...
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दिनेश कुमार माली
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[01 Jan 2010 20:40 PM]



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