ख्वाब

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... रात की बेहोशी में मैंने कुछ ख्वाब संभाल के तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.सोचा था होश आने पे भट्टी मेंपका के पुख्ता कर लूँगा,पर आँख खुली तो बेहोशी ने ख्वाब के चमकीले टुकड़े तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.--नीरज ... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

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[01 Jan 2010 18:17 PM]

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