ग़ज़ल - घर में रहते हुए भी
घर में रहते हुए भी मुझे बेघर सा क्यों लगता है!जाने से है चेहरे अनजाना शहर सा क्यों लगता है!!वोह जगह यहाँ तुम और हम खुश हों के रह सकें,हकीकत न हों इक ख्वाबी मंज़र सा क्यों लगता है!!रस्ते वही, पेड़ पौदे वही, यहाँ मिलते थे हम कभीफूल...
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आशु
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[01 Jan 2010 17:08 PM]



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