कुछ कहती सी रूक जाती हो
दोस्तों इस बार एक पुरानी कविता आपके सामने है ..लाइनें बिना बदले ...जैसी पहली बार लिखी थी.....बदलना सही नहीं समझा.....हो सकता है तारतम्य न हो लाइनों में ...मगर भाव जैसे थे मेरे ख्याल में, वैसे ही आपके सामने हैं...जब जब तुम्हारा ख़त पड़ता हूँ ख़त की चंद...
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boletobindas
कविता तुम....
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[01 Jan 2010 15:05 PM]



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