चुप्पी

feminist poems हम तब भी नहीं बोले थेजब एक टीचर नेबुलाया था उसे स्टाफ़रूम मेंअकेलेऔर कुत्सित मानसिकता सेसहलायी थी उसकी पीठडरी-सहमी वहरोती रहीसिसकती रही...हम तब भी नहीं बोलेजब बीच युनिवर्सिटी मेंखींचा गया थाउसका दुपट्टाऔर वहहाथों से सीने को ढँकेलौटी हॉस्टलफिर वापस... [पूरी पोस्ट]
writer mukti

आवाज़

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[01 Jan 2010 14:24 PM]

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