आएगी सुबह
जैसे आज सुबहघने अंधेरे से फूटी थी किरणेंजैसे नन्ही कली... ओस से दबीखिली थी धूप मेंजैसे रात की ठंड में सिकूड़ी नाजुक तितलीचहक रही थी... सुबह-सुबहजैसे अमावस के बादचांद फिर उभरा थावैसे ही उदासी का ये पल भी बीतेगादुख जाएगाखुशियां लौटेंगी ।।...
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जितेंद्र भट्ट
मेरी कविता
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[01 Jan 2010 09:54 AM]



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