मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ां "ग़ालिब"
शायरे आज़म-: मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ां "ग़ालिब"--------------------------------सितारे जो समझते हैं ग़लतफहमी है उनकी ।फ़लक पे आह पहुंची है मेरी, चिंगारिय़ां होकर ॥--------------------------------घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होताबहर अगर बहर न होता तो दरिया...
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A.U.SIDDIQUI
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[17 Nov 2009 03:41 AM]



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