एक शायर

महफ़िल ए आदाब कहीं ऎसा न हो दामन जला लोहमारे आंसुऔं पर ख़ाक डालो मनाना ही ज़रूरी है तो फिर तुमहमें सबसे ख़फ़ा हो कर मना लो बहुत रोई हुई लगती हैं आंखें मेरी ख़ातिर ज़रा काजल लगा लो अकेलेपन से खौ़फ आता है मुझकोकहां हो ऎ मेरे ख़ाबों - ख़यालों बहुत मायूस बैठा हूं मैं तुमसे कभी... [पूरी पोस्ट]
writer A.U.SIDDIQUI

एक शायर

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[26 Nov 2009 06:09 AM]

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