एक शायर
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखोज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखोसिर्फ आंखों से ही दुनिया नहीं देखी जातीदिल की धड़कन को भी बीनाई बनाकर देखोपत्थरों में भी ज़बां होती है दिल होते हैंअपने घर की दरो-ओ-दीवार सजा कर देखोवो सितारा...
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A.U.SIDDIQUI
ग़ज़ल
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[12 Dec 2009 03:32 AM]



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