एक ग़ज़ल
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वालावही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वालाकया कहें कितने मरासिम थे हमारे उससेवो जो एक शख़्स है मुंह फैर के जाने वालाक्या ख़बर थी जो मेरी जां में घुला रहता हैहै वही सरे - दार भी ...
[पूरी पोस्ट]
A.U.SIDDIQUI
ग़ज़ल
20
0
0
0
0
[19 Dec 2009 07:46 AM]



Shuffle








