जिगर मुरादाबादी

महफ़िल ए आदाब निगाहों का मरकज़ बना जा रहा हूंमुहब्बत  के  हांथों लुटा  जा रहा हूंन जाने कहां से, न जाने किधर कोबस एक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूंमुझे  रोक  सकता  हो  कोई  तो  रोकेकि  छुपकर  नहीं  बरमला  जा... [पूरी पोस्ट]
writer A.U.SIDDIQUI

जिगर मुरादाबादी

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[26 Dec 2009 19:24 PM]

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