एक शायर
रात भर एक जिस्म था जिस पर कई ख़न्जर चलेदिन निकल आया तो हर सिम्त से पत्थर चलेअपने सब मंज़र लुटा कर शाम रुख़्सत हो गईतुम भी वापस लौट जाओ हम भी अपने घर चलेनींद की सारी तन्नाबें टूट कर गिरती गईंमुझ को तन्हा छोड़ कर ख़्वाबों के सब पैकर चलेक़र्ब जब तख़लीक का हद से...
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A.U.SIDDIQUI
एक शायर
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[31 Dec 2009 08:04 AM]



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